हेलो फ्रेंड्स मेरा नाम अंकित है. और आपका फिर एक बार मेरे ब्लॉगर मे स्वागत है. तो बिना वक्त गवाए चलो शरू करते है.
आज हम बात करेंगे जूनागढ़ स्थित गिरनार पर्वत के उन हिस्से के बारे. जूनागढ़ के बारेमे तो आप जानते ही होंगे. काफ़ी हरा भरा शहर है वहां पर पहोच ते ही आपको पर्कृति का वो नजारा देखने का मिलता है. जिसे अपने सायद ही कही देखा होंगा.
वैसे तो आपको पता ही होंगा जूनागढ़ मे तो इतनी सारी जगह है जिसको देखते ही आपका मन आनंदमय हो जाएगा. जिसको देखते ही आँखों को ठंडक और मनको सुकून मिलता है.
तो ज्यादा टाइम गवाए बात करते है. Uparkot के बारेमे,
Uparkot पुराने किलों में से सबसे दिलचस्प है. पूर्व की ओर के पैरापेट्स, जहां जगह को उच्च भूमि की कमान दी गई है.
प्रवेश द्वार पूर्व की दीवार में शहर से परे है, और इसमें तीन प्रवेश द्वार हैं, जिनमें से एक दूसरे के अंदर है. किले की दीवारें 60 से 70 फीट ऊँची हैं, जिससे इमारतों का एक विशाल समूह बनता है। भीतरी प्रवेश द्वार, तोरण का एक सुंदर नमूना, जो बाद के इंडो-सारासेनिक कार्य में सबसे ऊपर है.
गेट के ऊपर प्राचीर पर मांडलिका, का एक शिलालेख है, दिनांक 1450. कस्टर्ड सेब के एक कण्ठ के माध्यम से बाईं ओर लगभग 150 गज, बेल-धातु की एक विशाल 10 इंच की तोप देखी जा सकती है.
उपरकोट की गुफाए 300 फिट गहराई पर दूसरी और तीसरी सदी मे बनाई गई है. इन गुफाओ तीन सत्तर मे बाटी गई है. तीनो मंजिलों मे. प्रथम माँजी पर एक कुंड है जो 11 चौरश फिट मे है. सारी मंजिलों के सतंभो पर काफ़ी सारे चित्र अंकित किये गए है. जो हमें दूसरी और तीसरी शताब्दी की याद दिलाती है.
तो दोस्तों आजके लिए इतना ही अगर आपको मेरा ये आर्टिकल पसंद आया हो तो like, शेयर, comment जरूर करना.
आज हम बात करेंगे जूनागढ़ स्थित गिरनार पर्वत के उन हिस्से के बारे. जूनागढ़ के बारेमे तो आप जानते ही होंगे. काफ़ी हरा भरा शहर है वहां पर पहोच ते ही आपको पर्कृति का वो नजारा देखने का मिलता है. जिसे अपने सायद ही कही देखा होंगा.
वैसे तो आपको पता ही होंगा जूनागढ़ मे तो इतनी सारी जगह है जिसको देखते ही आपका मन आनंदमय हो जाएगा. जिसको देखते ही आँखों को ठंडक और मनको सुकून मिलता है.
तो ज्यादा टाइम गवाए बात करते है. Uparkot के बारेमे,
Uparkot पुराने किलों में से सबसे दिलचस्प है. पूर्व की ओर के पैरापेट्स, जहां जगह को उच्च भूमि की कमान दी गई है.
प्रवेश द्वार पूर्व की दीवार में शहर से परे है, और इसमें तीन प्रवेश द्वार हैं, जिनमें से एक दूसरे के अंदर है. किले की दीवारें 60 से 70 फीट ऊँची हैं, जिससे इमारतों का एक विशाल समूह बनता है। भीतरी प्रवेश द्वार, तोरण का एक सुंदर नमूना, जो बाद के इंडो-सारासेनिक कार्य में सबसे ऊपर है.
गेट के ऊपर प्राचीर पर मांडलिका, का एक शिलालेख है, दिनांक 1450. कस्टर्ड सेब के एक कण्ठ के माध्यम से बाईं ओर लगभग 150 गज, बेल-धातु की एक विशाल 10 इंच की तोप देखी जा सकती है.
उपरकोट की गुफाए 300 फिट गहराई पर दूसरी और तीसरी सदी मे बनाई गई है. इन गुफाओ तीन सत्तर मे बाटी गई है. तीनो मंजिलों मे. प्रथम माँजी पर एक कुंड है जो 11 चौरश फिट मे है. सारी मंजिलों के सतंभो पर काफ़ी सारे चित्र अंकित किये गए है. जो हमें दूसरी और तीसरी शताब्दी की याद दिलाती है.
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